*कॉफी काफ़ी कड़वी है…**
कड़वी काफ़ी और मीठी ज़िंदगी, यह कॉम्बिनेशन ही कुछ और है
कॉफी का कड़वापन आहिस्ता जैसे ज़िंदगी में घुलता है,
ज़िंदगी का ज़ायका वैसे थोड़ा सर चढ़ बोलता है…
मीठी ज़िंदगी चाहिए मुझे, पर क्या बताएँ?
क्या बताएँ कितने हैं फ़साने, अजब गजब अफ़साने!!!
कितने हैं फ़साने, अजब गजब अफ़साने,
शुगर-फ़्री का ज़माना है, ज़ीरो शुगर पे ज़िंदगी चलाना है,
यह करें तो मुश्किल, वो करें तो हाय मेरा दिल…
उफ़, थक गई मैं इतना सोचते, चलो कोई नहीं…
चलो कोई नहीं, मिल बैठ के यारों के साथ हम कॉफी पी लेते…
कड़वी कॉफी की एक चुस्की का दम, और भूल गए ज़िंदगी के सारे ग़म…
बात तो है यह पते की है, कॉफी हो या ज़िंदगी,
कॉफी हो या ज़िंदगी,
दोनों का चस्का जो एक बार लगा ले, उस महक को साँसों में बसा ले,
आँखें खुल जाती हैं, ज़िंदगी दिख जाती है (2)…
क्या बताऊँ साहिब, क्या-क्या मसले हैं,
जो जागी हूँ तो ख़बर पढ़ी (2)
मुझ में और मेरी ख़्वाहिशों में कितने फ़ासले हैं…
पर चुप हो बैठना नहीं, सब कुछ मन में रख सहना नहीं
चल पड़ी हूँ अब उस मीठे से लक्ष्य की ओर…
पर उससे पहले… उससे पहले क्यों न फिर हो जाए,
**एक प्याली कड़वी-सी कॉफी…**

